भारत तुझको न जाने कितनो ने और भी लूटा है।
जो लूटा लूटा कहता है। वो ही सबसे झूठा है।
मुगलों ने फिर तुर्को ने फिर बने थे नृप इंग्लिश वाले
सब लूट रहे थे मन मौजी। छाए बादल काले काले।
सत्ता सिंहासन के खातिर भारत को बस बाट दिया।
सोने की इस चिड़िया को बस रस बतलाकर चाट लिया।
क्या गोरा था क्या काला था।
इस रस को चखने वाला था।
दिन बीते और शाख गई और तन टूटे।
लेकिन जड़ तो अब फैल गई। धानी चादर तो मैल भई।
और बना एक बस खूटा है।
भारत तुझको न जाने कितनो ने और भी लूटा है।
कुछ हुए वीर एकाकी थे। दुश्मन के खातिर फांसी थे।
दो चार हुए सेना नायक दो चार थे कुछ सुंदर गायक।
कुछ शेर शायरी वाले थे कुछ जंगल के रखवाले थे।
कुछ तो मर्दों का जोड़ा था। कुछ उसमे मर्दानी थी।
कुछ भगत सिंह के जैसे तो कुछ झांसी की रानी थी।
सब मिल एक देश के खातिर बन बैठे अभमानी थे।
कण कण तिल तिल कर सब मातृभूमि के कारण
भारत के हित तारण हारण।
जेल गए फांसी पाई।
तब जाके आजादी आई।
लेकिन इस पर भी कुछ लोगो ने राजनीति
कर कूटा है।
भारत तुझको ना जाने ...............
सत्ता का सुख पाने को बैठे है कुछ भी कर जाने को।
बिजली पानी और सड़क में जनता को भरमाने को
यही एजेंडा बेच बेचकर जन मानस को लूटा है।
भारत तुझको ना जाने ..............
एक वोट पाने के खातिर ईमान स्वयं का बेच दिया
घर बेचा बाहर बेचा , सम्मान स्वयं का बेच दिया।
नोच नोच करके खाने में लग गया जगत समूचा है।
भारत तुझको ना जाने .............
राजनीति के विज्ञानी जो स्वयं को नेता कहते है।
नेति नही है एक कौड़ी की,और लोकतंत्र में रहते है।
पांच साल में कर हलाल, अपना चमकाते जूता है।
भारत तुझको ना जाने ................
आनंद त्रिपाठी
लेखक की कलम से