कर्म बड़ा या भाग्य , उलझा है दिल ए नादान मेरा।
किस से पूछूं मैं किसे कहूँ चुप सा है भगवान मेरा।
घर की पूँजी सब खत्म हो गई बच्चों की शिक्षा में।
बिटिया की शादी कैसे हो अब बड़ा इम्तिहान मेरा।
किस किस की चौखट पर मैं नहीं गया ये न पूछो ।
घर के बर्तन बिक गए गिरवी हो गया मकान मेरा।
सोचा था इस बार फसल के दाम मिलेंगे अच्छे।
आज पटवारी मुझसे बोला बढ़ गया लगान मेरा।
बिटिया के हाथ पीले हो जाएं मैं चारो धाम करूँगा।
कुछ तो मैंने कर लिया है कुछ बाकी है इंतज़ाम मेरा।
लड़के वाले चाहें मुझसे"अर्जुन"मोटी रकम दहेज की।
मैं इस फिक्र में हूँ कहीं लौट न जाए मेहमान मेर।
अर्जुन इलाहाबादी