रिमझिम वर्षा हो जाऊँ
या तूफानी बन रह जाऊँ,
मीठी नदिया बन बह जाऊँ
या खारा समुद्र सा लहराऊँ।
चुभते काँटों सा बना रहूँ
या फूलों सा बन खिला रहूँ,
बिजली बन कड़क-धड़क करूँ
या दीप सा जला करूँ।
यज्ञ बन रहा करूँ
या विजय आकांक्षा धरा करूँ,
तपस्या में मिला करूँ
या वरदान ले चला करूँ।
*महेश रौतेला