ज़िंदगी --गीत सी
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दूरियाँ बुनते रहे ,नज़दीकियां गुनते रहे
जाने कितने हौसलों के गीत भी पलते रहे
दूरियां बुनते रहे -----------
मौन विगलित सी दिशाएं ,चीरती हर क्षण रहीं
और भ्रम के बीच दूरी साथ ही चलती रही
देह का मौसम तो आता और जाता ही रहा
प्राण का बेकल पपीहा गीत गाता ही रहा
श्वांस के भीतर सुलगते छंद सब गलते रहे
समय के इस चक्र में हम साथ ही चलते रहे
श्रावणी मौसम के पहरे भाल पर मलते रहे
दूरियाँ बुनते रहे ,नज़दीकियां गुनते रहे -------
साँस के इस प्रबंधन में उठती,गिरती आस होती
मौन के गुपचुप क्षणों में यातना अनुप्रास होती
सुप्त सब तारे यहाँ पर,कामना दृग में भरे हैं
और बोझिल हैं दिशाएं ,आस के कुछ बुलबुले हैं
देह-रथ से झांकती हैं कुछ सुकोमल कल्पनाएँ
और आँसू की न पूछो बहती केवल वर्जनाएँ
उलझनों के चक्र में फँस यातना चुनते रहे ----
दूरियाँ बुनते रहे ,नज़दीकियां गुनते रहे ------
मन -समुन्दर है यहाँ से झाँकती कुछ सीपियाँ हैं
प्रेम में बोए क्षणों से उजली सारी वीथियाँ हैं
प्रश्न स्कन्धों पर उठाए ,अर्थ पर दृष्टि गड़ाए
दूर से हम तक रहे हैं ,अब ज़रा नज़दीक आएँ
साधना के इन क्षणों में प्रेम के इन गुह्वरों में
साँस के बँधन से छुटकर कर आत्मा भरते रहे
हैं बहुत नज़दीक खुद से दूरियाँ छलते रहे ------
दूरियाँ बुनते रहे ,नज़दीकियां गुनते रहे --------
डॉ प्रणव भारती