झूठ का पेड़ कभी बड़ा नहीं हो सकता,
एक समय आने पर पेड़ मूल में से निकल जाता है,
फिर पेड़ की डालिया भी सूख जाती है और,
उनमें बस रहे जीव भी कहीं पे खो जाते है,
फिर क्या काम ऐसे पेड़ का जिसका कोई वजूद हीं ना हो,
वैसे हीं झूठ का कोई वजूद नहीं होता,
वक़्त आने पर जीत हंमेशा सच्चाई की होती है,
और झूठ की हर बार हार ही होती है।