अब कोई इम्तिहान है ही नहीं,
दूर तक आसमान है ही नही!
बात मैं आँसुओं से करता हूँ,
मेरे मुंह मे जुबान है ही नहीं!
उस नगर में छिपाऊं सर कैसे,
जिसमें अपना मकान है ही नहीं!
तुम तो पत्थर तुम्हे लुढकना है,
और आगे ढलान है ही नहीं!
एक सूरज हूँ ऐसा मैं जिसको,
रोशनी का गुमान है ही नहीं!
उसके तलबे भी चाट लो चाहे,
वक़्त अब मेहरबान है ही नहीं!
मेरी ग़ज़लों के साथ चलते रहो,
इस सफ़र में मकान है ही नहीं!