अपनी नाकाम तमनाओं का मातम न बनो॓
थम गया दौर-ए-मय-ए-नाव तो कुछ गम न करो
और भी कियने तरिके है बयान-ए-गम के
मुस्कुराती हुई आंखो को पुर-नम न करो
हां ये शमशीर-ए-हवादिस हो तो कुछ बात भी है
गर्दने तौक-ए--गुलामी के लिए खम न करो
तुम तो हो रिंद तुम्हे महफिल-ए-जम से क्या काम
ब्ज्म-ए-जम हो गई बरहम तो कोई गम न करो
वादा-ए-कोहना ढले सागर-ए-नौ में 'फितरत'
जौक-ए-फरियाद को आजुर्दा-ए-मातम न करो
.... अब्दुल अजीज' 'फितरत'