ज़िक्र खुद ही से केसे कर सकते हैं तेरा ,
बात तो ये भी है कि कर लेते हैं क़त्ल तेरा ।
आसमान में उड़ने का हुनर तो पा लें मगर ,
कैसे छोड़ दे लकीरों में बना अक्स तेरा ।
तुझे पास बुलाऊं कैसे , तेरे पास आऊं कैसे ,
इसी कस्मकस में होता है हर पहर मेरा ।
वक्त की रेत ने बांध बनाया है सिने में मेरे ,
छलकने पर उम्मीदो का दरवाजा खुलता है मेरा ।
'सुख' और 'खुश' - शब्दों की अदला-बदली है बस ।
पर 'दुख' और 'खुद' भी आयना बता देंगे तेरा ।