कभी दिल्ली कभी चंडीगढ़ तो कभी भटिंडा हूँ।
मेरा घर यहां नहीं फिर भी यहां का बासिन्दा हूँ।
कभी फुटपाथ तो कभी चाल का मैं नुमाइंदा हूँ।
मजदूर हूँ न! साहब एक रोटी के लिए जिंदा हूँ।
कभी ठेला कभी रेहड़ी कभी रिक्शा चलाता हूँ।
बच्चों का पेट भर के साहब खुद भूँखा सो जाता हूँ।
बिटिया बड़ी हो हई है वर की तलाश में हूँ।
चार पैसे मिल जाएं मुझे काम के आस में हूँ।
क्या आपके यहाँ मुझे कोई काम मिल जाएगा।
फर्श पर पोछा लगा दूँ आपको आराम मिल जाएगा।
काश काम के बदले मुझे मजदूरी मिल जाती तो।
कुछ पैसे में बच्चों के लिए आटा -दाल मिल जाएगा।
हर जाने वाले से मैं यही कहता हूँ ,
सुबह से ही लेबर चौराहे पर बैठा हूँ।
कोई दाम पूछ कर जाता है कोई बोलियां लगाता है।
हर कोई मजदूर है यहां चौराहे पर बिकने आता है।