तलाश है मुझे किसी ऍसे शख्स कि जिसे मेरी तकलीफ से ....
आहिस्ता-आहिस्ता बढ रही है चहेरे की लकीरे
लगता है नादानी और तजुर्बे में बटवारा हो रहा ।
जवानी की लालच में बचपन गया
और अब अमीरी की लालच में जवानी जा रही है।
तुमने तो कह दिया कि तुम मुझे जानते कितना हो
और मैने तो सनम तुम्हारी हंसी के पीछे के दर्द को भी पढा है।
महोबत में साहेब कोई हद नहीं होती
ईसलिए ये खुशियां भी बेहिसाब देती है और दर्द भी ।
तलाश है मुझे किसी एसे शख्स् की
एक बेवजाह स रिश्ता निभाए जा रहा हुं में
जिसे पता भी नही उसे चाहे जा रहा हु मैं ।
.............. मिर्जा गालिब