प्राण तो अभेद्य हैं
दुष्टता चतुर है,
भेद भी बहुत हैं
कठिन राह पर, सरल पग हैं।
सौ गालियों के बाद तो
सुदर्शन ही समाधान है,
शठ के लिए ही तो
दण्ड का विधान है।
तू चल कुछ कदम तो
सारथी है वहाँ,
तू बाण धनुष पर चढ़ा
संधान लक्ष्य कर वहाँ।
हस्त तो बढ़ा जरा
उठाने वाला शसक्त है,
तू स्नेह में रह यहाँ
पर दुष्टता में षडयंत्र है।
तू रथ पर चढ़ जरा
वह प्रतीक्षा में है वहाँ,
शठ के लिए ही तो
दण्ड का विधान है।
* महेश रौतेला