*संसार का वियोग नित्य है और संयोग अनित्य है* । यदि हम जीवन में सुख शांति चाहते हैं तो नित्य को पकडें । *जो संयोगकाल में ही वियोग का अनुभव कर लेता है , वह दु:खी नहीं होता* । हम अनित्य की इच्छा करके व्यर्थ में ही दु:ख पा रहे हैं । यदि संयोग भी हो जाए तो भी अन्त में वियोग ही नित्य रहेगा । अनित्य संयोग की लालसा ही बाधक है । इच्छा न करने पर भी होने वाला होगा , न होने वाला नहीं होगा । *संयोग ही अध्यस्त है , नित्य योग अधिष्ठान है* । " सुप्रभात जी "
।।जय सियाराम जी।।