रे रे कर्ण तेज पुत्र तू, स्वयं तेज तेरी पहेचान थी,
सरल तरल तव लालन पालन, तेरी क्या कोई स्पर्धा थी,
सारथ्य तव मातपिता का, क्षुद्रता ना कोई उसमे थी,
दुर्योधन के प्रति दासत्व मे,उसकी जो अवहेलना थी।
श्रेष्ठ-कनिष्ठ के व्यर्थ प्रतीद्वंद मे, परिक्षा क्यो करनी थी,
कर्म कुशलता प्रभु समर्पित,बस अर्जुन जैसी करनी थी।
एक निःहथ्थे बालक के आंतों, सब संग तलवार तुने परोई थी,
रे रे निष्ठूर!रणमे ढहे हुए पहिए की, राव न तुने करनी थी।
कवियों कथाकरों ने गाई महिमा, मुझे भी तेरी माननी थी,
पर जीत गया अर्जुन तब,पुत्रघाती अरथी पर घात जो रोकी थी।
चलो मान लिया केशव बीन अर्जुन से, बाज़ी तुने जीती थी,
पर क्या गौरव तव निष्ठा का, जो दुष्टो के संग जीती थी।
हे तेजपुरुष तुझ पर लिखते कलम मेरी भी कांपती थी,
उपकृत कभी न दुष्ट से हो, नमन तुझे ये सिख जो दी।
- मनीष पटेल