मैं तुम्हें खोजता रहूँ,
ढूँढता रहूँ,
स्वर्ग का आकार दे दूँ ,
या धरा का प्रभात सौपूं,
चलूँ तो , नाम ले लूँ,
विश्राम पर, याद कर लूँ,
बैठकों में , संज्ञान ले लूँ ,
उत्सवों में , पहिचान दे दूँ ,
हिमालय की उस हवा को
स्नेह से छूता रहूँ ,
गंगा के आभास को
डुबकियों में महसूस कर लूँ ,
विदा के बाद भी
तुम्हें इधर खोजता रहूँ ,
जिन्दगी के उस जहाँ तक
जागने का मन बना लूँ ,
मैं तुम्हें खोजता रहूँ
ढूँढता रहूँ,
मौन मीलों लेता चलूँ ।
* महेश रौतेला
०४.०८.२०१४