बड़े मासूम हो पर फिर भी आग लगाते हो।
प्यार बिल्कुल नहीं मुझसे फिर भी प्यार जताते हो
जाइये मुझे भी आदत है झूठे रिश्ते ढोने की।
लगता तो मैं कुछ भी नहीं मगर हक़ जताते हो।
लोग पहचान न ले मुझे इस लिए घर मे रहता हूँ
आप तो खूबसूरत हो फिर क्यो नकाब लगाते हो।
अब तो मुहब्बत भी सरे बाजार बिकने लगी है।
मुफ्त में पा लेते हो इश्क़ फिर क्यो दाम लगाते हो
मैं भी बेवकूफ हूँ जो बिना वजह खुद से बातें करता हूँ
सब आज़ाद हैं "अर्जुन" तुम क्यों लगाम लगाते हो।