शीर्षक: रैन- बसेरा
माना जीना भी एक कला है
सुख और दुःख की माला है
कहीं फूल और कहीं कांटे है
मिलेंगे, जो कर्म से छांटे है
विश्वास की चार- दिवारी है
ये दहलीज हमारी,तुम्हारी है
कहीं खुशियों के दीप जलते है
कहीं आँखों से आंसू झरतें है
अफसोस के रंग, गहरे होते है
प्रयास के कमरे, सुनहरे होते है
आलस की चादर पर कई दाग है
सलवटों में छिपा, हमारा भाग है
व्यवहार से सजा, ये रैन-बसेरा है
न समझना, ये घर तुम्हारा मेरा है
साँसों का ताला लगा, हर द्वार है
खो गई चाभी, घर से हम बाहर है
✍️ कमल भंसाली