यद्यपि बात करने को बहुत कुछ नहीं,
पर हँसेंगे,मुस्करायेंगे,गायेंगे,नाचेंगे
कुछ हटकर चलेंगे।
चलते-चलते ठोकरों को गिनते जायेंगे,
या फिर अपने ही सही कदम गिन लेंगे।
घर पहुंच कर सबको बतायेंगे
कि नदी पर जो नावें चल रही थीं
आकाश में जो बादल घुमड़ रहे थे,
जंगल में जो उथल-पुथल थी,
धरती जो संदेश दे रही थी,
लोगों में जो सुख- दुख हैं,
उन सब का सारांश मैं लाया हूँ।
**महेश रौतेला
०२.०६.२०१८