*छंद : मनहर*
*(वियोगन का मिलन वर्णन)*
फूलों भी महेक करे साँसों में अगन भरें,
बरसों के बाद आज पियु घर आयो है,
मदन के बाण चले चाँदनी धीरे से ढले,
रंग अंग अंग और अंतर समायो है,
ऊँगली में ऊँगली हैं फूलों की टूटी कली है,
अकाल भूखे ने जैसे पेट भर खायो है,
भ्रमर की गुन गुन साँसों में साँसों को बून,
प्रेम का जो सोमरस पियु ने पिलायो है ।
*- भाविन देसाई 'अकल्पित'*