विषय: करो, ना, *करोना*
सहज नहीं रहा, साँसों का आना जाना
रंग ढंग बदल रोज, ये नाजायज "करोना"
करो, ना, से तो हमने सदा प्यार ही किया
इनके संगम से क्या करोना ईजाद हुआ ?
गहराई कहती, आंखे जो सदा खुली न रहती
वहीं से विपताओं की जड़े, हरी होकर ही उगती
देश हमारा, हमने ऐसा शायद ही दिल से माना
हद कोई पार करे, स्वभाव हमारा, तभी जागना
देश- चिंतन, जबानी लेखा- जोखा में ही रह जाता
समय के अनुसार, नेताओं की आंखों से बह जाता
खुद्दारी क्या होती ? अब तो ये भी हम भूल रहे
गरीब इतने हो गये, अपनी ही रोटी मांग कर खा रहे
अंत मे सच ही कह देते, करोना हमें नहीं मार रहा
देश भक्षी नेताओं का कहर, करोना को भी शर्मा रहा
सवाल बिना उत्तर का रहा, इतने साल क्या किया ?
देश स्वतंत्र हुआ, तब का गरीब,अब गरीब कैसे रहा ?
✍️ कमल भंसाली