चलो, धूप का शहर बसायें
उसमें ऊर्जा के वृक्ष लगायें,
अपना कहा फिर दोहरायें
चले पगों की धूल हटायें।
चलो, फूलों का गाँव बसायें
उसकी सुगंध में जीवन रोपें,
सूरज से कुछ दिन लिखायें
चाँद से कुछ रात चुरायें।
अपना ओझल चित्र बनायें
अदृश्य आँखों में बस कर देखें,
एक बिन्दु से आगे जाकर
सशक्त एक पंक्ति खींच दें।
* महेश रौतेला