*दुःख की हमारे जीवन मे क्या भूमिका है*
सुख और दुख वस्तुतः मनुष्य की अपनी अनुभूति है जो समय के अनुसार बदलती है जिसको हम इस तरह से समझ सकते हैं कि जिस प्रेमिका से हम विवाह करने के लिए पल पल तड़पते रहते हैं पत्नी बनने के कुछ दिनों पश्चात ही कभी-कभी ऐसी स्थिति का निर्माण हो जाता है कि उसके साथ जीना दूभर हो जाता है, यहां तक की तलाक की स्थिति भी आ जाती है. आज जो कार हमने ली है वह कुछ दिनों के बाद हमारे लिए सिर्फ़ सामान्य वस्तु रह जाती है.
जिस धन के लिए हम जी तोड़ मेहनत करते है, तड़पते है, वही धन एक समय के बाद संभालना भी कठिन हो जाता है, वास्तव में देखा जाए तो *शारीरिक पीड़ा को छोड़कर किसी प्रकार का दुख होता ही नहीं*. सुख और दुख हमारी समसामयिक अनुभूति मात्र है. मनुष्य की वर्तमान जीवन शैली में प्रतिस्पर्धी सोच के कारण दुख की अनुभूति बहुत अधिक हो गई है. आज मेरे पास जो कार मुझे सुख नहीं दे रही है पड़ोसी के पास उससे अच्छी कार देखकर मैं दुखी हूं.
हमारी दृष्टि में ही अधिकांश सुख और दुख की भूमिका निर्भर है. हम सब मूलतः असंतुष्ट है और यही कारण हैं कि हमारे जीवन मे दुःख की भूमिका बहुत अधिक हो चुकी है.
*तेजकरण जैन, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़*