कुछ किस्से थे ज़ज्बातों के अरमानों के
वो अकेली ही तो चली थी उन राहों पर
मतलब था और मतलबी लोग भी थे
बोलने वाली ना जाने कितनी ज़ुबां भी थी
फर्क था तो सिर्फ इतना की वो सुन नहीं सकती थी
ऐसा नहीं था कि कान नहीं था
पर दिल पे जो दस्तक दे ये वो आवाज़ नहीं था
गूंजती थी वो आवाजे को चीर कर रख दे दिल को
पर उस कहां समझ थी वो अकेली बड़ी मदमस्त थी
तुम बोलो जितना बोल पाओ होसके तो जान ले लो
उसे कहां परवाह किसी की वो मस्त अपने धुन की पक्की
खुद से खुद की राह बनाती वो दिलेर लड़की
प्यारी मासूम मुस्कान सी लड़की
हां कुछ कुछ मुझ जैसी लड़की