एक गाना था जो मुझे बेहद पसंद था ,
( रुके रुके से कदम रुक के बार बार उठे )
पर कभी समझ ना पाई की ये गाना क्यों पसंद ह
कुछ पाया कुछ खोया , कुछ पाते पाते छूट गया
जैसे प्यासी तो हूं पर हर जगह बस रेत ही रेत
कोई पास आया तो मैं डर गई कोई दूर गया तो रो पड़ी
ज़िन्दगी मानो दवा जैसी हो कड़वी पर ना खाओ तो मौत
कुछ देर लगी समझने में पर समझ आया
की क्यों बचपन में वो इमली कि खट्टी मीठी गोली अच्छी लगती थी ,
क्यों वो छुपपन छुपाई का खेल पसंद था
आज समझ आया क्यों ये गाना पसंद था इतना
( रुके रुके से कदम रुक के बार बार उठे
करार ले के तेरे दर से बेकरार उठे )