दिशा सूचक यंत्र वास्तु
दिक्सूचक (Compass) दिशा का ज्ञान कराने वाला यंत्र है। यह यंत्र महासागरों और मरुस्थलों में दिशा निर्देशन के बहुत काम आता है या उन स्थानों पर भी जहाँ स्थानसूचकों की कमी है। दिक्सूचक का प्राथमिक कार्य एक निर्देश दिशा की ओर संकेत करना है, जिससे अन्य दिशाएँ ज्ञात की जाती हैं। पुराने ज़माने में लोग दिशाओं को जांचने के लिए सूर्य के प्रकाश से बनने वाली परछाइयों को बहुत बारीकी से देखा करते थें। अब दिशाओं को जानने के लिए दिशा सूचक यंत्र का प्रयोग किया जाता हैं। हालाकिं दिशाएं कुल मिला कर 10 होती है। लेकिन दिशा सूचक यंत्र केवल 8 दिशाओं की ही जानकारी दे सकता है।
दिशा सूचक यंत्र कुल 360 अंश का होता है। जिसकी त्रिज्या हर 45 अंश पर अगली दिशा में पहुँच जाती है। प्रत्येक दिशा के भीतर अंशो के स्तर को जांचना भी वास्तु का एक महत्वपूर्ण आयाम है।
दिशाएं कुल मिला कर 10 होती है।
उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम ये चार मुख्य दिशाएं है। इनके अलावा चार उपदिशाएं है। जो मुख्य दिशाओं के बिच पड़ने वाले कोनो को दर्शाती है।
ये उपदिशाएं है- उत्तर और पूर्व के बीच (ईशान कोण), दक्षिण और पूर्व के बीच (आग्रेय कोण), दक्षिण और पश्चिम के बीच (नैऋत्य कोण), उत्तर और पश्चिम के बीच (वायव्य कोण), आकाश, पाताल।
वास्तु अनुसार दिशाएं
पूर्व
पश्चिम
उत्तर
दक्षिण
उत्तर और पूर्व के बीच (ईशान कोण)
दक्षिण और पूर्व के बीच (आग्रेय कोण)
दक्षिण और पश्चिम के बीच (नैऋत्य कोण)
उत्तर और पश्चिम के बीच (वायव्य कोण)