© योग्यता
इतनी योग्यताओं से
लबरेज़ हो गया है…
यह इंसान.. कि..
जीने- बचाने से
उलट…
मरने - मारने के..
उपाय रचने लगा है,
इसे ही विकास…
मानने लगा है..,
ये क्या !
अब तो वह
जीवन में भी
मृत्यु के अवसर
तलाशने लगा है..,
यह कैसी योग्यताओं से..
अब लबरेज़…
होने लगा है।
हा..! धिक्कार !
यह कैसी योग्यताओं से..
अब लबरेज़…
होने लगा है?
सादर प्रस्तुति..
डॉ.अमित कुमार दवे,खड़गदा