*बुद्ध का कुण्डळीया*
मन भगवा तब ओढ़ लो ऐक शरण है बुद्ध,
तज संताप तन मन का अंतर मन कर शुद्ध,
अंतर मन कर शुद्ध जगत है मोह व माया,
लालच है अनिरुद्ध कभी संतोष न पाया,
कहत कवि संकेत में हो प्रियदर्शी अशुद्ध,
मन भगवा तब ओढ़ लो ऐक शरण है बुद्ध।।
*- भाविन देसाई 'अकल्पित'*
*अर्थात*
बुद्ध एक वो स्थिति है जिसमे वैराग है, प्रेम है, करुणा है, एक ठहराव है। तन मन के सभी तनाव को त्याग, मन को पाप मुक्त, शुद्ध कर के बुद्ध शरण अपनाओ। इस जगत की झगमग और कुछ नही बस मोह माया है। सब आभासी है और कुछ नही। इंसान का लालच जो कभी नहीं रुकने वाला है। वो अनिरुद्ध है, जिसको कभी भी रोका नहीं जा सकता। इस लिए काव्य में संकेत द्वारा कहा गया है कि, जब भी राजा अशोक याने इंसान का 'मन' अशुद्ध होने लगे; बुद्ध स्थिति अपना लो अर्थात बुद्ध की शरण अपनाओ।