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क्या फर्क पड़ता है अंधेरा है या उजाला
हमें तो हर लम्हा डर लगता है।।
साथ हो कोई अपनाया या चलू अकेले इन राहों पे,
हर तरफ इंसानी भेड़ियों के नजरों से डर लगता है।।
बचपन को फिर से सब जीना चाहते हैं,
मगर मुझे अपनी बच्ची होने पर डर लगता है।।
औरों को तो खतरा उनके दुश्मनों से होता है,
हम लड़कियों को तो खतरा पूरी दुनिया से होता है।।
ना मां के गर्भ में महफूज रहते है,
ना हीं बचपन में,
सिर्फ उम्र के एक पड़ाव पर अपनी हवस का शिकार बनाये जाते हैं।।
सदियों पहले भी प्रथा थी सती होने की,
लेकिन आज भी तो दहेज के नाम पर जलाया जाता है।।
पहले तो गर्भ में मार देते थे अब बलात्कार से तड़पाया जाता है।।
हालात अब भी वही है सिर्फ तरीका बदला है,
लड़कियों को ना जाने क्यों इस तरह आजमाया जाता है।।
अब भी डर लगता है खुद की ही परछाई से ना जाने क्यो,
धोखा देने में परछाई का भी तो कोई जवाब नहीं।।
बचपन को बेरुखी से मार दिया जाता है,
और जवानी को डर से मार दिया जाता है।।
क्या बदला है और क्या बदलेगा,
हर मोड़ पर सिर्फ लड़कियों को ही दगा दिया जाएगा।।
हां आज भी डर लगता है,
खामोश अल्फाजों से,
और जुबान वालों की खामोशी से,।।
आज भी डर लगता है।। "SA"