चार पैसे जो कम हुए जिन्दगी मे
हम दर दर यू ही भटकने लगे
हम छुपाते रहे दर्दे गम सभी से,
लोग हम से ही दुर जाते रहे।
चार.....
आज ये देखो तो हम कहा आ गए,
लोग हमसे नज़रे बचाते रहे।
चार.....
हम जिसे अपना समझ खिलाया जिन्हें,
हर त्यौहारो पर उपहार पहुंचाते रहें।
चार....
हम आज भी उतने ही खाश है,
बस लोग बेवक्त का हमको बताते रहे।
चार....