रूप बदलि कै बने किसाना ,कबहुँ उगाइन एकु न दाना ।
बहति नदी बिच धोवै हाथा ,देखहि भीड़ हिलावै हाथा ।
जौ किसान कय किरपा होई ,कुरसी दूरि न हमसे होई ।
पत्रकार कै भा अब चाँदी ,लै माइक भागैं जस आँधी ।
खतरनाक वै खबरि चलावैं ,आम आदमी का डेरवावैं ।
कुछ खरीद कय बहसी लावैं,रोज शाम का उन्हैं लड़ावयं।