जख्म ए दिल को मैंने हरबार गजब दिया गलिब,
सारी उम्र भर जलता रहा अश्कों के अहम को दबा कर।
समझ ना सका मुझे ये एक तिनका प्यार के काबिल,
और में सुनता रहा उसकी जख्म भरी तारीफ ख़ामोश हो कर।
जिंदगी भी कहा अब हमारे साथ रह पाई है,
पनाह मांगी थी हमने जिसे खुदा मानकर।
आज वही खुदा मेरे हिस्से में खूबियां ढूंढके,
हर मरतबा चला गया बीच राह में अकेला छोड़कर।
ये उनकी महेरबानियाँ भी दिल को काँटो की तरह चुभ रही,
सारे आम दुनियाँ के इस रीतिरिवाज़ों में रहकर।
बस अब ठहरा दे कही मुजे ख़्वाबोख्यालो में, औऱ
इसके जवाब,
इसके जवाब भी मैं सुनूँगा ए ख़ुदा तेरे दरबार मे आकर।
DEAR ZINDAGI 🌹♥️