हसने- हसाने का जमाना था,
सब कुछ आसान- सा था।
किताबो- बस्तो तक हिस्सेदारी थी,
बस परीक्षा पास करने की जिम्मेदारी थी।
सिर्फ कलम का ऋण था,
और न लौटाने से क्लेश भी नहीं था।
सब एक जैसे कपड़ों में मिलते थे,
फिर भी अपना अलग व्यक्तित्व रखते थे।
वो हसने - हसानें का जमाना था,
उसमे सब कुछ आसान सा था।