# विषय .मानव " #
# विधा .कविता ***
मानव होकर ,मानवता को ही खा रहा ।
कैसा धोर कलियुग ,आज आ गया ।।
अबला असहाय ,महसूस करने लगी ।
धर से निकलना ,उसका दुस्वार हो गया ।।
बेटा ही माँ बाप ,का दुश्मन निकला ।
धर से बेधर कर ,वृद्धाश्रम में ले गया ।।
अब संबध केवल ,दिखावटी ही रह गया ।
आँखों में शर्म लाज तो कब की मर गयी ।।
सुदंरता तो मोहने ,का एक मंजर था ।
उसमें तो अब ,व्यभिचार का कलंक लग गया ।।
विश्वास तो कब का ,बलिवेदी पर चढ़ गया ।
अपना ही अपनो ,का दुश्मन हो गया ।।
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