चल घर (गांव) चलते है इस शहर ही जिंदगी से,
चल घर चलते है उस मिट्टी को पूजने के लिए,
चल घर चलते है त्यौहारों सी रौनक में,
चल घर चलते है पुराने यारों की टोली में,
चल घर चलते है माँ की ममता के लिए,
चल घर चलते है बाप की फिर एक डाट के लिए,
चल घर चलते है फिर खुले आसमान में घूमने फिरने के लिए,
चल घर चलते है फिर दादी की कहानियाँ सुनने के लिए,
चल घर चलते है फिर उस गली में शोर करने के लिए
त्यौहारों का असली मजा तो गाँव मे ही आता है ।
- देवाराम पटेल