वह देते-देते नहीं थका है
हम थके-थके से लगते हैं,
हम राह-राह पर अटके हैं
वह राह बनाता जाता है।
कुछ सुगन्ध उसकी आती है
कुछ आभास हमको होता है,
हम टहल-टहल कर ढूंढ रहे हैं
वह स्थान-स्थान पर रहता है।
हम फूं फां कर के चलते हैं
वह परच्छाई सा रहता है,
समय हमारा कट जाता है
वह अकाट्य ही रहता है।
** महेश रौतेला