गाउ के बाहर जो सुमसान है, वो ही मेरा दयार है,
इन्सान से ज्यादा मुजे उस पर बहुत ही प्यार है।
बहुत गाए है हमने यहां नगमा-ए-जान-फिजान,
अब दर्द का राग सुनलो तुम, यह टूटा हुआ तार है।
गफ़लत में रहे है हम ताउम्र इस दुनिया की भीड़मे,
मिस्ल-ए-शाम जैसे जले तो भी, मेरा कर्ज उधार है।
खुदा यह उम्र-ए-दराज कहा कहा ले जाती है मुजे,
जहाँ टूट गई सब सांसे पता चला वह कु-ए-यार है।
खिजान का आगमन हो चुका मनोज हो जा तैयार,
यह तेरा गुरुर, तेरी शोहरत सिर्फ मुस्त-ए-गुबार है।
मनोज संतोकि मानस