बहुत दिनों से इंतजार कर रही थी
पूनम की रात का
जब उसका चाँद पूरे
शबाब पर हो।
समा जाना चाहती थी वह
अपने प्रियतम के आगोश में।
विभावरी ने पहन ली थी
सितारों से सजी सुनहरी ओढ़नी।
अपने चाँद को वह जी भर कर
देख लेना चाहती थी
करवा चौथ पर किसी सुहागन
के देखने से पहले।
बसा लेना चाहती थी उसकी
मनमोहिनी छवि हमेशा
के लिए अपने हृदय में ।
क्योंकि इसके बाद
उसका चाँद घटने लगेगा।
और फिर यह सौभाग्यशाली
प्रेम का प्रतीक दिन
तो साल भर बाद ही आएगा।
जिस दिन कान्हा ने कई
रूप धारण कर गोपियों संग
रास रचाया था और अमर
कर दिया इस शरद पूर्णिमा की रात को।
स्वरचित
जमीला खातून