यादें,
भूलभुलैया गलियों सी,
बीते लम्हों में भटकते
समय का पता ही नहीं चलता,
गुलाब के बगीचे सी
खुशबू के संग कड़वी यादों के
तमाम कांटे भी चुभते हैं।
बारिश के फुहारों सी,
तप्त मन को शीतल कर देते हैं,
बन्द मुट्ठी में रेत सी
लाख कोशिश करो रोकने की,
फिसल ही जाती हैं,यादें।