बहुत भावुक हूँ मै !
शायद इसीलिए ,
शिकायते बहुत हैं |
न जाने क्यों उम्मीद,
का आकर्षण खींच लेता है
इन्हे अपनी ओर |
और ये हो जातीं हैं ,
बेबस और कमजोर |
चलों एक प्रयोग करती हूँ ,
भावनाओं के घर से निकल,
उम्मीदों को कम करती हूँ |
क्षीण होती अपनी वास्तविक,
ऊर्जा को अपने सामर्थ्य में पुनः भरती हूँ |
ये भावनाये ही तो है जो,
दो क्षण ठहरकर , बना लेती हैं,
कहीं भी घर |
किन्तु हकीकत तो यह है कि,
यह होती हैं, बेघर |