मौला, अली, खुदा क्या कहूँ यारो,
उसका ईमान भी क्या चीज़ है ख़ुद्दार।
इश्क़-ए-रूह से जुड़े अल्फ़ाज़ की हलचल,
फरेबी, धोका, जूठ के बुनियाद की मरम्मत।
दूरियाँ जैसे बदल ने का इत्तेफाक है वक़्त पर,
दर्द-ए-दिल को बेशुमार दर्द का वस्ता दे कर।
जान से जान का वास्ते जी ते जी जान को अलग रख कर,
मरहम भी क्या बेशूमार लगाया जख्म अदा कर।
यादों को भूल ने पर मौत का आवरा इंतजाम रख कर,
बेहिसाबी कोरे पन्नो की बढ़ा दी रकम उसके जिस्म-आे-जान को छू कर।
DEAR ZINDAGI 💞🌹