शुन्यकी करामत
अय दुनिया वालों मुजे निकम्मा न समजो,
मैं भी जिंदा हुं, मेरी भी कोई हस्ती है !
मुजे समजो तो जानो के मै कौन हुं ?
मेरी हस्ति को मत भुलो, मैं कौन हु !
ऐसे तो मै सिर्फ शुन्य हुं,
फीर भी मेरी कोई किंमत है !
अय अंको तुम्हारी औक़ात मेरे पर निर्भर है,
मैं हुं तो तुम्हारी किंमत है, वर्ना कौन तुम्हें पुछता ?
तुम्हारी आगे हो कर, तुमारा गर्व खंडीत करता हुं,
और पीछे रहकर तुम्हारा गर्व बढाता हुं !
ए मत भूलो के मैं कौन हुं और क्या हुं ?
मैं सिर्फ शुन्य हुं फीर भी, मैं विशीष्ट हुं !
.....उमाकान्त वि.महेता.(न्यु जर्सी)