लौट कर जा रहा हूँ तुम्हे छोड़ पूरे शहर से मुंह मोड़ कर,
अगर हो सकता तो में दे सकता तुम्हे तु जान भी देकर पहचाना जाते।
गलियों, में जाते सड़क पैड पौधे हर कोई मुझे पहचानते है,
तुझे देख ने के लिए कुछ कदम चले उसमे छाले लगे पड़े थे आते जाते।
मायूस हुआ उम्र गुजारने पर तेरे साथ जो अब रुक्सद हो ना है,
तुम हो नहीं साथ तो एक जख्म तो सीने में जलने के लिए छोड़ जाते।
वो रात के अंधेरे सुबह के उजाले में जो मेरी इबादत कर रहा था,
वो फुल भी तो आज मुराजा कर नए दिन की शुरुआत के लम्हे नहीं लाते।
कच्चा था मकान बनाया मेरे दिल से अरमान का जो पा ना सका,
तुम तो होठ में भी तो एक सागर की प्यास बुजा कर पक्का जहां बना पाते।
रों रों कर अब में समझ गया कैद कमरों में और ए चार दीवार में फस दुनिया भूल गया हूँ,
यूं हसते चहेरे से दिल में नफ़रत ले मुस्कुराने का अवसर भी दिखाते जाते।
हम से मुसाफिर की तरह सफ़र में कई लोग निकले देख मुझे मुस्कराते होते,
वहा ठहर कर बेमौत ना मर जाऊ यादों के जरिए सफ़र में बिछाए हुए कांटो को कहीं छुपा तो जाते।
DEAR ZINDAGI 🤗