तुम्हने कभी सुना है, गोलुक क्या पूछता है?
आज भी तुम जिस रास्ते से गये वो चूमता है।
आंसूओ में बहने लगा जमुना जी का नीर,
भूल गए क्या, मुरलीधर से बने तुम रणधीर,
कान्हा तुम भी अब गोकुल सारा चुभता है।।
समय की पुकार थी या ओर किसी से प्यार था,
एक बार मुड़के तो देख लेते कितना इंतजार था।
सोने की नगरी में क्या हमारी पुकार सुनता है?
मुरझा रही है आंखे, निःप्राण हो गई है राधे,
सुख गया वो कदम का पेड़ कितनी कातिल यादे,
राधा हाल मनोज बेहाल है, वो पीताम्बर बुनता है।
मनोज संतोकि मानस