कुछ पल के लिए थामा था हाथ अकेलेपन का,
और तन्हाई ने मेरा हाथ जकड़ लिया,
वास्ता ना था ख़ामोशी से मेरा,
ना जाने क्यूं पर एक रिश्ता सा लगने लगा है,
एक अंगार रखता था अपने भीतर पर
अब तो पूरा शरीर सुलगने लगा है,
समझ नहीं आता कहीं खो रहा हूं में या रो रहा हूं,
हर वक़्त लगता है जैसे आखिरी नींद सो रहा हूं,
क्या करे जनाब अब तो खुद का दिल ही ठगने लगा है
कुछ बताता नहीं है
अब तो मुझे भी मेरे अंदर कुछ बदला बदला सा लगने लगा है।।
-Ki Shan S Ahu