धर्म अधर्म का खेल
एक सभा में बैठे लोगों ने
🎲खेला एक खेल🎲
कोई हारे कोई जीते
था तो वह एक खेल
परन्तु बना खेल जब
😡प्रतिशोध का आधार😡
तो खेल में हारे अपना तन,मन, धन ओर साहस
पर मिला न इतने पर भी चैन
तो खेल को बन डाला छल का आधार🎲
हुआ फिर छल पे छल
न मिला संतोष मन को
मोह,वासना, अहंकार, धर्म, अधर्म, क्रोध, प्रतिशोध का
था यह सारा खेल
फिर किया गया छल से,
एक ऐसा अधर्म,
जिसमें लगा दाव पर एक स्त्री का आत्म सम्मान।🧍♀️
थे बैठें वहाँ वीरो से वीर महान👥
साहसहीन बैठें सभा में,
⚔️शस्त्र धारण हुआ न किसी से,
सारे बने मोन धारक।🤐
हुआ स्त्री का सभा में घोर अपमान🙍♀️
वस्त्र हरण जैसे घोर घृणित कार्य को दिया धर्म का नाम।
क्या किसी का धर्म📚
क्या किसी का प्रण
क्या किसी का वचन
क्या किसी का छल
क्या किसी की विवशता😔
थी एक स्त्री के सम्मान से बड़ी
नही था यह सब जरूरी तब
हो जहाँ एक स्त्री का अपमान
वहाँ सारे धर्म कार्य हो जाते है अधर्म
किये पुन कर्म भी होंगे तब विफल।
ऐसे कुकर्म के बने हो भागी सारे आज
जन्मो-जन्मो तब मिटेगा न ये दाग़।👤
(धर्म अधर्म का खेल है सारा जिसमें रची महाभारत की गाथा!)
ज्योति कुमारी