हालत-ए-मुनासिब भी ना थे तो क्या
इक लम्हें की तो मुलाक़ात कर लेते.. !!
ज़िन्दगी थोड़ी सी बची भी थी तो क्या
ओरो से पहले अपनों को याद कर लेते.. !!
शहर में थी बहुत मुश्किलें भी तो क्या
ज़रा गांव अपने को ही याद कर लेते.. !!
अरमा ऊंचे भी जो थे तिरे भी तो क्या
कुछ हालत-ए-ज़मीनी से ही गुज़र लेते.. !!
ऐ ज़माना भी ना तुझें देखें भी तो क्या
अस्क अपना ही थोड़ा आईने में देख लेते.. !!
अब गुज़र जानें भी दे ये ज़िन्दगी दोस्त
काश रिश्तों की ही थोड़ी अमानती कर लेते.. !!