सूत्रधार—डॉ॰ शैल अग्रवाल, यू के / मेरे नाम के प्रस्तावक—सुश्री.शोभना श्याम जी ( Shobhana Shyam ) एवं सीमा सिंह (Seema singh)
नदी, पुल और आदमी
नीचे बहती नदी और ऊपर उसके दोनों किनारों को जोड़ता हुआ पुल | पुल पर से रात और दिन धड़धड़ाते हुए गुजरते तरह-तरह के वाहनों को देखकर एक दिन नदी पूछ ही बैठी, “दिन भर तुम पर इतना वजन लदा रहता है, तुम्हें परेशानी नहीं होती ?”
“पागल हो तुम, यह भी कोई बात हुई ! मुझ पर से वाहन नहीं गुजरेंगे तो लोग तुम्हें पार कैसे करेंगे ? मेरा तो निर्माण ही इसलिए हुआ है बहन |” पुल ने सहजता से कहा |
पुल की इस बात पर नदी खिलखिलाकर हँस पड़ी |
उसकी हँसी से खिन्न पुल ने कहा, “इसमें हँसने की क्या बात है बहन ! तुम वर्षों से बहती आ रही हो | यहाँ पर तुम्हारा पाट विशाल है और प्रवाह अति तीव्र | और हाँ, जब तुम हँसती हो तो मुझे कभी-कभी बहुत डर लगता है |”
“डर और मुझसे, लेकिन क्यों ?”
“बरसात में जब तुम अपना पाट फैलाकर विकराल रूप धारण करती हो तो मुझे लगता है कि न जाने कब तुम मुझे अपने में समाकर बहा ले जाओ |” पुल की आवाज में आशंका थी |
“डरो मत, ऐसा नहीं होगा | लेकिन जितनी संख्या में और जिस गति में गाड़ियाँ तुम पर से गुजरती हैं मुझे तो उससे भय लगता है कि कहीं तुम मुझ पर ही न गिर पड़ो | भीड़ कितनी बढ़ गई है, तुम कब तक सहन करोगे ? कभी ऐसा हुआ तो गाड़ियों के साथ ही न जाने कितने आदमी मुझमें समाकर अपनी इहलीला समाप्त कर जायेंगे |” नदी ने आशंका प्रगट की |
धड़धड़ाकर गुजरते एक ट्रक से पुल सचमुच ही काँप उठा |
“बहन, यदि कभी ऐसा हुआ तो इसमें दोष तो मानव का होगा मगर कसूरवार मैं ठहरा दिया जाऊँगा | मैं कमजोर नहीं हूँ मगर मेरी भी सहने की एक सीमा तो है ना !”
“मानव का लालच बढ़ता ही जा रहा है और उसी लालच के वशीभूत वह तेज गति से दौड़ता जा रहा है | मैं चाहती हूँ कि वह कुछ पल के लिए अपनी अन्धी दौड़ को छोड़कर मेरे किनारों पर बैठकर मेरे शीतल जल से अपनी आँखों पर छींटे मारे |” नदी ने अपनी इच्छा व्यक्त की |
“मैं भी चाहता हूँ बहन, मनुष्य कुछ देर के लिए अपनी रफ्तार भूलकर मुझ पर खड़ा हो जाए और तुझे और नीले आसमान को निहारने का आनन्द ले |” नदी की इच्छा सुनकर पुल ने भी अपने मन की बात कह दी |
उन दोनों ने एक-दूसरे की इच्छा पूरी होने के लिए ‘आमीन’ तो कहा, लेकिन पुल पर तेज गति से दौड़ते वाहनों के शोर में उसे किसी ने न सुना | *
कल्पना भट्ट