बचपन
बचपन अपना ऐसा था कि ख़्वाब जवानी चलती थी
अब आई जवानी ऐसे कि बचपन की याद सताती है
हम रहते थे घर पर अपने संग साथ सभी याराने थे
अब व्यस्त हैं अपने आप में सब बस याद पुरानी आती है
बचपन के गलियारे वो बचपन की वो फुलवारी
समय कट गया कुछ ऐसे कि बीत गयी यादें प्यारी
बस यादों के एक कोने में वो बात सदा चली आती है
वो बचपन की बीती यादें मुझे आकर रोज़ सताती हैं
बचपन का साया ऐसा था ना कोई बात सताती थी
कुछ भी करते कहीं भी रहते ना कोई चिंता खाती थी
यारों के संग खेल कूद में दिन छोटा पड़ जाता था
दिन के जैसे रात भी हमने यारों के संग काटी थी
हर पल आता याद मुझे वो बचपन अपना ऐसा था
सूरज तारे - दिन और रातें लगता सब इक जैसा था
अपने ही धुन में रहते बस सबकुछ इतना सुंदर था
बीत गया वो पल ऐसे जैसे गुमनाम समुन्दर था
आगे क्या होगा इसका भी हमको था बिल्कुल इल्म नहीं
ख्वाबों की दुनिया में जीना बस था हमको मालूम यही
राही थे इक मंज़िल के जिसका कोई रहगुज़र नहीं
सच कहें तोह बचपन के बिना जीने जैसा कोई जीवन ही नहीं
एक यही याद ही ऐसी है जो नई ताज़गी लाती है
सारी दुनिया घूम ली हमनें बस वो बचपन की याद सताती है
बस वो बचपन की याद सताती है
©रजत वर्मा