अपनों से दूर सरहद पर
डटे वीरों की क्या खता
उन्हें तनिक भी नहीं पता
क्या हो रहा उधर घर पर
कभी हफ्ते दो हफ्ते पर
जब फौजी डाकिया आता
उसे देख वीरों का मन भी
पलांश भर को है ललचाता
भारी भरकम थैली उसकी होती
जिसमें पूरे पलटन की चिठ्ठी होती
किसी पाती में कुछ गम तो
किसी में कुछ ख़ुशी मिलती
पल भर में सब कुछ भूल कर
बंदूक उठा लेते अपने सीने पर
सोच कर माँ भारती की संतान
तत्पर रहते न्यौच्छावर करने प्राण