जिस रूप में ढालना चाहो,ढाल लेना----
ए मेरे मौला
अब ओर कितना ढालूँ
खुद को तुझ में?
कह तो दिया है
तुम्हे
मिट्टी बना दो मुझे
फिर चाहे
जिस रूप में ढालना चाहो
ढाल लेना
मुझे पता है
जब तक
जीती रही बुद्धि में
तब तक
डरती रही
अपना अस्तित्व खोने से
पर
जब से आया
हृदय से जीना मुझे
अब किस बात का डर
पूर्ण रूप से
खोना है तुझ में ही
फिर
कुछ बाकी ना रहे खुद का
वही तो होना है........