मिलकर साथ रहना खलल है , यदि खुद की निजता में
यदि सुख - दुख बांटना उपहास है , इस आधुनिकता में
तो मुझको माफ करना बे हिचक , ऐ आधुनिक लोगों
हटाओ आंख से परदा , सच्चाई देखकर जागो
अकेला आदमी लड़ नहीं सकता , हर मुसीबत से
साथ चलता जो अपनों संग , निकलता अाई आफत से
कम से कम देखकर चेतें , जो तन्हां होते हैं अक्सर
हैं दस्तक देते कई मसले , परेेशां रहते जीवन भर
झूंठ की नींव पर है टिकी , मंज़िल नए ख्वाबों की
ख्वाब तो ख्वाब ही रहते , कारण बनते तनावों की
ये जीवन है बड़ा अनमोल , इसको यूं ना दुत्कारें
अमानत है किसी की यह , इसको अब तो स्वीकारें
अकेले को मसल दे कोई भी , इतना तो संभव है
तोड़ दे गट्ठर लकड़ी का , ये तो बिल्कुल असंभव है
सीख बचपन की कब सीखेंगे , गुज़रे सर से अब पानी
हकीकत अब तो पहचानें , करेंगे हम कब तक नादानी
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#माफी